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FIRST GRADE GK Patwar RAJASTHAN HISTORY REET

नीति निर्देशक तत्त्व व मूल कर्त्तव्य

नीति निर्देशक तत्त्व एवं मूल कर्तव्य

❖ राज्य द्वारा जातिगत आधार पर भेदभाव न किया जाना प्रत्येक व्यक्ति को न्यूनतम आवश्यकताएं राज्य द्वारा प्रदान किया जाना।

❖ भारतीय संविधान के भाग 4 में नीति निर्देशक तत्वो में आर्थिक एवं सामाजिक न्याय की स्थापना की गई जो राज्य सरकार के दायित्व में है।

❖ डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने भाग 4 को ‘आर्थिक एवं सामाजिक न्याय का घोषणा पत्र’ कहा।

नीति निर्देशक तत्व निम्न है :-

❖ राज्य के नीति के निर्देशक सिद्धांत भारतीय संविधान की एक अनोखी विशेषता है। संविधान निर्माताओं ने इन सिद्धांतों की प्रेरणा आयरलैंड गणराज्य के संविधान से ली है, जिसमें एक अलग अध्याय राज्य की नीति के निर्देशक सिद्धांतों पर है ।उन पर मानव अधिकार घोषणा पत्र का भी प्रभाव पड़ा था। परंतु इन बातों का अर्थ यह नहीं है कि हमारे संविधान में निर्देशक सिद्धांतों के रूप में विदेशी विचार अंकित किए गए हैं । इसमें से बहुत से सिद्धांत पूर्णत भारतीय हैं और हमारे राष्ट्रीय आंदोलन के आधार पर स्तंभ रहे हैं । इसमें से अनेक ऐसे आदर्श हैं जिनकी प्राप्ति के लिए गांधीजी ने जीवन भर परिश्रम किया था।

निर्देशक सिद्धांतों का अर्थ एवं उद्देश्य:

संविधान निर्माताओं का उद्देश्य भारत में कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है| इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने संविधान में निर्देशक सिद्धांतों को स्थान दिया सामूहिक रूप से यह सिद्धांत भारत में आर्थिक एवं सामाजिक लोकतंत्र की रचनाएं करते हैं | जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट हो जाता है, ये सिद्धांत देश की विभिन्न सरकारों के नाम से जारी किए गए निर्देश है जिनका उनको पालन करना तथा जिनके अनुसार इनको अपनी नीति निर्धारित करनी है यह सिद्धांत शासन व्यवस्था के मूल तत्व है | संविधान की धारा 37 में लिखा हुआ है कि राज्य का यह कर्तव्य है कि देश के प्रशासन के लिए कानून निर्माण करते समय इन सिद्धांतों को लागू किया जाए संविधान की प्रस्तावना में जिन आदर्शों का उल्लेख किया गया है, ये सिद्धांत उनकी और बढ़ने के लिए पथ प्रदर्शन का कार्य करते हैं| वस्तुत यह सिद्धांत उन आदर्शों की गणना है जिसकी प्राप्ति भारत करना जी का लक्ष्य है|

नीति निर्देशक सिद्धांतों का महत्व :

❖ भारतीय संविधान में नीति निर्देशक सिद्धांतों का महत्वपूर्ण स्थान है इनका महत्व की दृष्टि से है|

1. संविधान निर्माताओं का उद्देश्य भारत में कैसी समाज व्यवस्था की स्थापना करना था जिसमें सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय मिले| दूसरे शब्दों में संविधान निर्माता, राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र स्थापित करना चाहते थे| नीति निर्देशक सिद्धांतों का उद्देश्य भारत में सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना का प्रयत्न करना है |

2. नीति निर्देशक सिद्धांत उन संसाधनों तथा नीतियों को बतलाते हैं जिनका अनुसरण कर भारत में कल्याणकारी राज्य अथवा सच्च लोकतंत्र की स्थापना की जा सकेगी ।

3. नीति निर्देशक सिद्धांत कार्यपालिका व्यवस्थापिका के लिए अनुदेश पत्र है| इनके कारण राज्य की नीति में स्थिरता आती है, क्योंकि सरकार चाहे किसी भी दल की बने इन सिद्धांतों को ध्यान में रखकर ही अपनी नीतियों व कार्यक्रमों पर निर्धारित करेगी|

4. नीति निर्देशक सिद्धांत इन उद्देश्य को स्पष्ट करते हैं जिंद के पालन में विश्व में स्थाई शांति की स्थापना हो सकेगी |

मूल अधिकार तथा निर्देशक सिद्धांतों में अंतर

1. मूल अधिकारों को न्यायालय का संरक्षण प्राप्त है | यदि सरकार मौलिक अधिकारों में अनुचित करती है तो न्यायालय में उसके विरूद्ध अपील की जा सकती है | इस तरह न्यायालय मौलिक अधिकारों की रक्षा करते हैं | निर्देशक सिद्धांत यद्यपि शासन व्यवस्था के मूल तत्व है परंतु इनके न्यायालयों का संरक्षण प्राप्त नहीं है| यदि राज्य इन सिद्धांतों का पालन नहीं करता तो न्यायालय से लागू करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता |

2. मूल अधिकार नागरिकों के कानूनी अधिकार है| इनका पालन करना सरकार के लिए आवश्यक है | यह सरकार के लिए प्रकार से कानूनी कर्तव्य है | इनका पालन करना सरकार का नैतिक कर्तव्य है|

3. मूल अधिकार नागरिकों के अधिकार है, अतः वे नागरिकों से संबंधित है , जबकि नीति निर्देशक सिद्धांत राज्य से संबंधित है तथा राज्य की नीतियों के निर्धारण में पथ प्रदर्शन का कार्य करते हैं |

4. मूल अधिकार भारत में राजनीतिक लोकतंत्र के प्रतीक है जबकि निर्देशक सिद्धांत देश में आर्थिक तथा सामाजिक लोकतंत्र कायम करना चाहते हैं | संक्षेप में हम चाहते हैं कि निर्देशक सिद्धांत मूल अधिकारों के पोषक तत्व है | इनके अभाव में लोग अपने मूल अधिकारों का सच्चा लाभ नहीं उठा सकेंगे |

नीति निर्देशक सिद्धांतों का वर्गीकरण

❖ संविधान के भाग 4 में अनुच्छेद 36 से 51 तक राज्य की नीति के निर्देशक सिद्धांतों का वर्णन किया गया है |अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से इन सिद्धांतों अतः तत्व को निम्नलिखित वर्गों में बांटा जा सकता है |

( क) आर्थिक सुरक्षा संबंधी निर्देशक सिद्धांत : संविधान निर्माताओं का उद्देश्य भारत में एक लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना था | इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु सविधान में अनेक निर्देशक सिद्धांतों की व्यवस्था की गई है यह सिद्धांत निम्नलिखित हैं |

1. संविधान के अनुच्छेद 39 के अनुसार राज्य अपनी नीति इस प्रकार निर्धारित करेगा जिससे कि ।

(क) सभी नागरिकों स्त्रियों और पुरुषों को समान रूप से जीविका निर्वाह के पर्याप्त साधन प्राप्त हो सके।

(ख) देश के भौतिक साधनों के स्वामित्व और नियंत्रण का ऐसा वितरण किया जाए जिससे अधिक से अधिक सार्वजनिक हित हो सके।

(ग) संपत्ति और उत्पादन के साधनों का इस प्रकार केंद्रीकरण ना हो कि सार्वजनिक हित को किसी प्रकार की बाधा पहुंचे।

(घ) स्त्री और पुरुष दोनों का सामान कार्य के लिए समान वेतन मिले।

(ङ) श्रमिक पुरुषों और स्त्रियों के स्वास्थ्य तथा शक्ति एवं बालकों की सुकूमार अवस्था का दुरुपयोग न हो तथा आर्थिक आवश्यकता से विवश होकर नागरिकों को ऐसे कार्य करने के लिए बाध्य न होना पड़े जो उनकी आयु अथवा सामर्थ्य के अनुकूल न हो ।

(च) बच्चों को स्वस्थ रूप से विकास के लिए अवसर और सुविधाएं प्रदान की जा सके इन्हें स्वतंत्रता और सम्मान की स्थिति प्राप्त हो तथा स्वस्थ और युवावस्था की रक्षा स्वतंत्रता नैतिक और भौतिक परित्याग से भी की जा सके।

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