मेवाड़ के गुहिल वंश History of Mewar

मेवाड़ का इतिहास (History of Mewar)

मेवाड़ के प्राचीन नाम :-

1. मेदपाट

2. प्राग्वाट

3. शिवि जनपद

गुहिल वंश :- 566 ई.

❖स्थापना – गुहिल ने 566 ई. में ।
❖ गुहिल वंश की 24 शाखाओं थी ।
❖इसमें मेवाड़ के गुहिल सबसे प्रमुख थे ।
❖ मेवाड़ के गुहिल सूर्यवंशी थे ।

बप्पारावल 734 ई.

❖ यह हरित ऋषि का अनुयायी था ।
❖ राजस्थानी – नागदा (उदयपुर) , सास-बहू का मंदिर
❖ नागदा में एकलिंग मंदिर (शिव जी ) का निर्माण करवाया ।
❖ मेवाड़ के राजा खुद को एकलिंग जी आराध्य देव का दीवान मानते थे।
❖बप्पारावल मुस्लिम सेना को हराते हुये गजनी तक चला गया ।
❖इसने गजनी के शासक सलीम को हटा दिया और अपने भांजे को वहाँ का शासक बनाया ।
❖रावल पिंडी शहर का नाम बप्पारावल के नाम पर पड़ा ।
❖मेवाड़ में सोने के सिक्के चलाये ।
❖सोने के सिक्के का भाव 115 ग्रे था ।
❖बप्पारावल का वास्तविक नाम कालभोज था ।
❖सी.वी. वैद्य ने बप्पा रावल को राज. का चालर्ज मेटकॉफ कहा ।

उपाधियों :-
हिन्दू सूरज, राज गुरु ,चक्कवै

अल्लट

❖अन्य नाम :- आलू रावल
❖दूसरी राजधानी :- आहड़(उदयपुर)
❖आहड़ में बराह मंदिर (विष्णु जी ) का निर्माण करवाया ।
❖मेवाड़ में नौकरशाही प्रशासनिक की स्थापना की थी।
❖हूण राजा की कुमारी हरिया देवी से शादी की थी।

मेवाड़ वंश को हिंदुआ सूरज कहा जाता है।

जैत्रसिंह – 1213 – 1250

❖भूताला का युद्व:- 1227 ई.
❖जैत्रसिंह v/s इल्तुतमिश (दिल्ली)
❖जैत्रसिंह को विजय
❖जानकारी- जयसिंह सूरी द्वारा रचित हम्मीरमदमर्दन से।
❖इल्तुतमिश की भागती सेना ने नागदा को लूट लिया था , उसके बाद जैत्रसिंह ने चितौड़ को नई राजधानी बनाई ।
❖जैत्रसिंह का शासन काल मध्यकालीन मेवाड़ के स्वर्ण काल कहा जाता है ।

रतनसिंह 1302 – 1303 ई.

❖छोटा भाई – कुम्भकर्ण (नेपाल चला गया)
❖राणा शाखा का शासन स्थापित किया ।
❖अलाउद्दीन खिलजी का चित्तौड पर आक्रमण -1303 ई.
कारण :-
(1) साम्राज्य नीति के कारण अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण।
(2) चितौड़ का व्यापारिक तथा सामरिक महत्व ।
(3) अलाउदीन खिलजी के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न ।
(4) चितौड़ का बढ़ता हुआ प्रभाव।
(5) पद्मिनी को पाने की लालसा ।

रानी पद्मिनी :-

❖पिता – गंधर्व सेन ,माता – चम्पावती
❖राघव चेतन नामक ब्राह्मण ने अलाउद्दीन को पद्मिनी की सुंदरता के बारे में बताया ।

❖ 1303 में चितौड़ का साका हुआ ।

❖ रानी पद्मिनी ने 1600 महिलाओं के साथ जौहर किया।

❖ रतनसिंह के सेनापति – गौरा व बादल।

❖ चितौड़ का भार अपने पुत्र ख़िज्र खां को सौप कर उसका नाम खिज्राबाद रखा ।

❖ खिज्र खां ने गम्भीरी नदी पर पुल का निर्माण करवाया।

❖ खिज्र खां ने चितौड़ में मकबरे का निर्माण करवाया (इस मकबरे पर एक अभिलेख है जिसमे अलाउद्दीन खिलजी को ईश्वर की छाया तथा संसार का रक्षक बताया गया है)।

❖खिज्र खां ने बड़े दिनों बाद चितौड़ का शासन मालदेव सोनगरा को दे दिया , जिसे मूंछाला मालदेव भी कहा जाता है ।

पदमावत-

❖लेखक – मलिक मोहम्मद जायसी
❖ 1540 में अवधी भाषा मे लिखी है।
❖इसमें पद्मिनी की सुंदरता का वर्णन है।
❖जेम्स टॉड व मुहणौत नैणसी ने इस कहानी को स्वीकार किया ।
❖ सूर्यमल्ल मिश्रण ने इस कहानी को स्वीकार नही किया।
❖अलाउद्दीन के आक्रमण की जानकारी- अमीर खुसरो की पुस्तक – खजाइन उल फुतुह (तारीख ए अलाइ) में मिलती है।
❖ हेमरत्न सूरी – गौरा बादल की चौपाई (महाराणा प्रताप के दरबार में।
❖ रावल उपाधि का उपयोग करने वाला अंतिम राजा रतनसिंह था ।

हम्मीर 1326 – 1364

❖बनवीर सोनगरा को हराकर चितौड़ पर अधिकार । हम्मीर सिसोदा ग्राम का था इसलिये गुहिल वंश की सिसोदिया शाखा का शासन प्रारम्भ हुआ ।
❖इसने राणा की उपाधि का प्रयोग किया।
❖हम्मीर को मेवाड़ का उद्धारक कहा जाता है ।
❖कीर्ति प्रशस्ति में हम्मीर को विषम घाटी पंचानन कहा गया है।
❖रसिक प्रिया पुस्तक में हम्मीर को वीर राजा कहा गया है।
❖चितौड़ में तरबड़ी माता (अन्नपूर्णा)(गुहिल वंश की ईष्ट देवी / आराध्य देवी )माता का मंदिर बनवाया।

❖कुल देवी – बाणमाता
❖ सिसोदा गाँव का संस्थापक- राहप

राणा लाखा 1382 -1421

❖ वास्तविक नाम – लक्ष सिंह
❖ जावर (उदयपुर) में चांदी की खान प्राप्त हुई ।
❖इसके समय एक बंजारे ने पिछोला झील का निर्माण करवाया ।
❖कुम्भा हाड़ा नकली बूंदी के किले की रक्षा करते हुए मारा गया।

❖राणा लाखा के पुत्र चूंडा को मेवाड़ के भीष्म कहा जाता है ।

मोकल 1421-1433

❖ पिता – लाखा , माता – हंसा बाई
❖ संरक्षक – चूंडा
❖ मेवाड़ के 16 प्रथम श्रेणी में से 4 चूंडा को दिये गये। जिनमें सलूम्बर भी शामिल था।
❖हरावल :- सेना का अगला भाग । सलूम्बर का सामन्त
❖चंदावल :- सेना का पिछला भाग।
❖हंसा बाई के अविश्वास के कारण चूंडा मालवा(हौंशगशाह सुल्तान) चला गया।
❖ हंसा बाई का भाई रणमल मोकल का संरक्षक बना ।
❖एकलिंग मंदिर का परकोटा बनवाया मोकल ने ।
❖चितौड़ में समद्धिश्वेर मंदिर (निर्माण – भोज परमार ,वास्तविक नामक – त्रिभुवन नारायण मंदिर)का पुनर्निमाण करवाया।
❖ 1433 में गुजरात के अहमद शाह ने चितौड़ पर आक्रमण किया।जीलवाड़ा नामक स्थान पर चाचा ,मेरा व महपा पँवार ने मोकल की हत्या कर दी।

कुम्भा 1433 – 1468

❖पिता – मोकल ,माता – सौभाग्यवती परमार
❖संरक्षक – रणमल
❖कुम्भा ने रणमल की सहायता से पिता की हत्या का बदला लिया।
❖मेवाड़ दरबार मे रणमल का प्रभाव बढ़ गया।उसने सिसोदिया के नेता राघवदेव (चूंडा का भाई)की हत्या करवा दी।
❖हंसा बाई ने चूंडा को मालवा से वापस बुलाया । भारमली की सहायता से रणमल को मार दिया ।
❖रणमल का बेटा जोधा मेवाड़ से भाग कर बीकानेर के पास काहुनी गाँव ने शरण ली।
❖चूंडा मंडोर पर अधिकार कर लेता है ।
❖आंवल – बावल की संधि :- 1453 (जोधा और कुम्भा के मध्य ) जोधा को मारवाड़ दे दिया गया और सोजत को मेवाड़ व मारवाड़ की सीमा बनाया गया है।
❖सारंगपुर का युद्ध – 1437 (कुम्भा व  महमूद खिलजी मालवा के मध्य)
❖कारण :- महमूद खिलजी ने मोकल के हत्यारों को शरण दी थी।
❖विजय :- कुम्भा- जीत की याद में चितौड़ में विजय स्तम्भ का निर्माण।
❖ चम्पारेन की संधि -1456 (महमूद खिलजी मालवा व कुतुबुद्दीन शाह गुजरात )
❖संधि का उद्देश्य कुम्भा को हराना ।
❖बदनौर का युद्ध – 1457 :-
❖ कुम्भा ने मालवा व गुजरात की संयुक्त सेना को हराना।
❖ कुम्भा ने मुजाहिद खां के विपक्ष शम्स खां(नागौर ) की सहायता की।

❖ कुम्भा की सांस्कृतिक उपलब्धिया :-
1. स्थापत्य कला :- कुम्भा को राज. की स्थापत्य कला का जनक कहा जाता है ।
2. विजय स्तंभ :-
❖ सारंगपुर के युद्ध की जीत में
❖ अन्य नाम :- कीर्ति स्तम्भ , विष्णु ध्वज ,गकण ध्वज, मूर्तियों का अजायबघर , भारतीय मूर्ति कला का विश्वकोश
❖ यह 9 मंजिला है। लंबाई 122 फुट ,चौड़ाई 30 फुट
❖ 8 वी मंजिल पर कोई मूर्ति नही है ।
❖ तीसरी मंजिल पर 9 बार अरबी भाषा में अल्लाह लिखा हुआ है ।
❖ वास्तुकार :- जैता, पूजा , पोमा , नापा।
❖ 9 वीं मंजिल पर बिजली गिरने पर महाराणा स्वरूप सिंह ने इसका पुनर्निर्माण करवाया।
❖ कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति के लेखक अत्रि तथा महेश थे ।
❖ राजस्थान की पहली ईमारत जिस पर डाक टिकट जारी किया गया। 15 अगस्त 1949
❖ प्रतीक चिन्ह :- राजस्थान पुलिस, राज. माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (RBSE) , अभिनव भारत(वीर सावकार द्वारा नासिक में गठित क्रांति कारी संगठन।
❖ जेम्स टॉड ने विजय स्तम्भ की तुलना कुतुबुमीनार से की ।
❖ फर्ग्यूसन ने  इसकी तुलना रोम के टार्जन टॉवर से की ।
❖कविराजा श्यामदास की पुस्तक वीर विनोद के अनुसार कुम्भा ने मेवाड़ के 84 में से 32 किलो का निर्माण करवाया।(1) कुम्भलगढ़ दुर्ग :- राजसमंद
❖ वास्तुकार- मण्डन
❖ कुंभलगढ़ प्रशस्ति के लेखक महेश थे। इस प्रशस्ति में कुम्भा को धर्म एवं पवित्रता का अवतार कहा गया है।
(2) अचलगढ़ दुर्ग:- सिरोही
❖ 1452 में पुनर्निर्माण कुम्भा द्वारा ।
(3) बसन्ती दुर्ग :- सिरोही
(4) मचान किला :- सिरोही
❖ मेर जनजाति पर नियंत्रण के लिये।
(5) भोमट दुर्ग :- उदयपुर
❖ भील जनजाति पर नियंत्रण के लिये।

❖ मंदिर :-
1.कुम्भश्याम मंदिर :- तीन जगह बनाये। विष्णु भगवान का ।(चितौड़गढ़, कुंभलगढ़, अचलगढ़)
2. श्रृंगार चंवरी मंदिर :- चितौड़गढ़
❖ यह शांतिनाथ जैन मंदिर है जो बेल्फा भंडारी ने बनवाया।
3. रणकपुर जैन मंदिर :- पाली
❖ 1439 में जैन व्यापारी धरक शाह द्वारा निर्मित।
❖इसमें सबसे प्रमुख चौमुखा(यह आदिनाथ ऋषभ देव का ) जैन मंदिर है।
❖ इस मंदिर में 1444 स्तम्भ है।इस मंदिर को स्तम्भों का अजायबघर कहा जाता हैं। इस मंदिर का वास्तुकार देपाक था।

❖ जैन कीर्ति स्तम्भ :- 7 मंजिला, 12 वी शताब्दी में जीजा शाह बघेरवाल ने बनवाया।, यह भगवान आदिनाथ(ऋषभ देव ) को समर्पित है ।, इसे आदिनाथ स्तम्भ भी कहा जाता हैं।
❖ साहित्य :- कुम्भा की
संगीत में निपुण , वीणा बजाया करता था ।, कुम्भा के संगीत गुरु सारंग व्यास थे ।
❖ पुस्तके :- सुधा प्रबंध, कामराज रतिसर 7 भाग , संगीत सुधा,संगीत मीमांसा,संगीत राज 5 भाग (पाठ्य रत्न कोश,गीत रत्न कोश , नृत्य रत्न कोश,वाद्य रत्न कोश ,रस रत्न कोश )

❖ टीकाए:-
1. जयदेव की गीतगोविन्द पर रसिक प्रिया नाम से टीका लिखी।
2. सारंगधर की संगीत रत्नाकर पर टीका लिखा।
3. चंडीशतक पर टीका लिखी ।

❖ नाटक :- मेवाड़ी भाषा मे चार नाटक लिखे ।
❖ कुम्भा मेवाड़ी ,मराठी तथा कन्नड़ भाषाओं का विद्वान था।

❖दरबारी विद्वान :-

1. कान्ह व्यास :- एकलिंग महात्म्य (इसका पहला भाग राज वर्ण है , जिसको कुम्भा ने लिखा।) की रचना।
2. मेहा :- तीर्थ माला की रचना , जिसमे 120 तीर्थो का वर्णन है ।
3. मंडन :- वास्तुसार , देवमूर्ति प्रकरण , राजवल्लभ, रूपमंडन- मूर्तिकला के बारे में।, कोदण्ड मण्डन- धनुष निर्माण के बारे में ।
4. नाथा :- यह मण्डन का भाई था। , वस्तु मंजरी की रचना ।,
5. गोविंद:- मण्डन का बेटा , पुस्तक- द्वार दीपिका ,कला निधि {शिखर निर्माण की जानकारी },उद्धार धोरिणी ,सार समुच्चय- आयुर्वेद के बारे में।
नाट्य शास्त्र :- भरत मुनि द्वारा रचित ।
6. रमा बाई :- कुम्भा की पुत्री,संगीत में निपूण ,उपाधि – वागीश्वरी,इसे जावर क्षेत्र दिया गया, प्राचीन नाम योगिनी पत्तन
7. हीरानंद मुनि :- कुम्भा के गुरु
8. तिला भट्ट :-
9. सोमदेव सूरी :- जैन विध्दान
10. सोम सुंदर सूरी:- जैन विध्दान
11. जय शेखर :- जैन विध्दान
12. भुवन कीर्ति :-जैन विध्दान
❖ तीर्थ यात्रा पर कर जैनो  से समाप्त किया कुम्भा ने |

❖कुम्भा की उपाधियों :-

1. हिन्दू सुरताण :- मुस्लिम सेना को हराने के कारण ।
2. अभिनव भरताचार्य :- संगीत
3. राणा रासौ :- साहित्य
4. हाल गुरु :- पहाड़ी किले जितने के कारण
5. चाप गुरु :- धनुष कला में प्रवीण
6. परम भागवत :- गुप्त शासको के बाद भागवत की उपाधि
7.आदि वराह :- गुर्जर प्रतिहार

❖कुम्भा की हत्या उसके बेटे उदा ने कुम्भलगढ़ किले में की ।

रायमल  

❖ पिता – कुम्भा
❖ एकलिंग मंदिर का वर्तमान स्वरूप बनवाया ।
❖ रायमल की पत्नी श्रृंगार कंवर में घोसुण्डी में बावड़ी बनवाई ।
❖ घोसुण्डी अभिलेख :-
1. 2 वी शताब्दी ई.पू.
2. वैष्णण धर्म की जानकारी देता है ।
3. राज. का प्राचीनतम अभिलेख ।
4. राजा सर्वतात द्वारा अश्मेघ यज्ञ करवाया ,की जानकारी देता है।

❖ पृथ्वीराज :-

1. रायमल का सबसे बड़ा बेटा था , इसे उड़ना राज कुमार कहा जाता था ।
2. पत्नी – तारा – अपनी पत्नी के नाम अजमेर दुर्ग का नाम तारागढ़ रखा ।
3. छतरी – कुम्भलगढ़ किले में (12 खंभों)

❖ जयमल :-

1. रायमल का बेटा
2. सौलंकियों से युद्ध लड़ते मारा गया ।

संग्रामसिंह (राणा सांगा) 1509- 1528

❖ रायमल का बेटा
❖ सांगा ने श्रीनगर (अजमेर ) के कर्मचंद पंवार ले पास शरण ली ।

❖ इब्राहिम लोदी (दिल्ली ) :- खातोली का युद्ध 1571(कोटा) – सांगा की विजय
बाड़ी का युद्ध 1518 (धौलपुर ) _ सांगा की विजय
❖ गागरोन का युद्ध 1519 :- सांगा व  महमूद खिलजी (मालवा ) ( सांगा की विजय )
❖ सांगा ने चंदेरी के मेदिनीराय को गागरोन का दुर्ग दिया ।

❖ बयाना का युद्ध :- 16 फरवरी 1527 :-
❖सांगा और बाबर के बीच (सांगा की विजय )
❖इस युद्ध मे बाबर का सेनापति – मोहम्मद सुल्तान मिर्जा
❖ बयाना दुर्ग का रक्षक – मेहंदी ख्वाजा

खानवा का युद्ध :-

❖ भरतपुर में 17 मार्च 1527 (वीर – विनोद के अनुसार 16 मार्च )
❖ राणा सांगा और बाबर के बीच ( बाबर विजय )
❖ बाबर ने जिहाद (धर्म युद्ध ) की घोषणा की ।
❖ बाबर ने शराब पीना छोड़ दिया ।
❖ बाबर ने तमगा कर( मुसलमानो से लिया जाने वाला व्यापारिक कर ) हटा दिया ।
❖ सांगा ने इस युद्ध मे राजस्थान के सभी राजाओ को बुलाया (1. पाती परवन नीति ,2. आमेर – पृथ्वीराज,3. मारवाड़ – मालदेव (राजा गंगा ),4. बीकानेर – कल्याणमल (राजा जैतेसी), 5. मेड़ता – वीरमदेव ,6. सिरोही – अर्खेराज देवड़ा ,7. सलूम्बर – रतन सिंह चुंडावत ,8. सादड़ी – झाला अज्ज़ा,9. मेवात – हसन खां मेवाती , 10. महमूद लोदी -इब्राहिम लोदी का भाई,11. चंदेरी – मेदिनीराय , 12. रायसीन- सलहदी तंवर ,13. ईडर – भारमल
❖इस युद्ध मे सांगा घायल हो गया । झाला अज्ज़ा ने युद्ध का नेतृत्व किया ।
❖ सलहदी तंवर ने राणा सांगा से विश्वासघात किया ।
❖ नागौर के खान जादे मुसलमानों ने भी विश्वासघात किया ।

❖ युद्ध मे बाबर की विजय हुई |

❖ इस युद्ध में तुलुगमा पद्धति व तोपखाने का उपयोग बाबर ने किया ।
❖ बाबर ने गाजी (धर्म नेता) की उपाधि धारण की ।

❖ बसवा (दौसा):- घायल सांगा का इलाज हुआ ।

❖ इरिच (MP) :- सांगा को जहर दिया गया ।

❖कालपी (MP) :- सांगा की मृत्यु।

❖मंडल गढ़(भीलवाड़ा) :- सांगा की छतरी ।

❖ सांगा की उपाधियां  :-

1. हिन्दू पत

2. सैनिको का भग्नावशेष (80 भाव):-
3. हरिदास चारण ने महमूद खिलजी -II को पकड़ा , इसलिये सांगा ने उन्हें 12 गांव दिए |
4. कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार सांगा के अधीन 7 राजा ,9राव ,104 सरदार थे ।
5. सांगा के सबसे बड़े पुत्र भोजराज की शादी मीरा बाई से हुई थी।
6. सांगा के बाद रतनसिंह राजा बना , वह बूंदी के सूरजमल हाड़ा के खिलाफ शिकार खेल खेलते हुए मारा गया ।

विक्रमादित्य 1531-1536

❖ पिता – सांगा , माता – कर्मावती (संरक्षिका )
❖ गुजरात के बहादुर शाह ने 1533 में मेवाड़ प आक्रमण किया ।कर्मावती ने रणथंभौर किला देकर संधि की ।
❖ बहादुर शाह ने 1534-35 में पुनः आक्रमण किया । कर्मावती ने हुमायूँ को राखी भेजी और सहायता की मांग की
❖ इस समय चित्तौड़ का दूसरा साका हुआ ।
❖ रानी कर्मावती के नेतृत्व में जौहर हुआ ।
❖ देवलिया ठाकुर बाघसिंह (प्रतापगढ़ का पुराना नाम) के नेतृत्व में केसरिया किया गया।
❖ बनवीर को चित्तौड़ का प्रशासक बनाया गया ।
❖ बनवीर उड़ना राज कुमार पृथ्वीराज की दासी पुत्र था ।
❖ बनवीर ने विक्रमादित्य की हत्या कर दी । पन्ना धाय ने अपने बेटे चंदन का बलिदान देकर उदयसिंह को बचा लिया । कुम्भलगढ़ के आशा देवपुरा ने पन्ना धाय व उदयसिंह को शरण दी ।

उदयसिंह 1537-1572

❖ मावली का युद्ध – 1540 (उदयसिंह व बनवीर के बीच हुआ , जिसमे उदयसिंह विजय )
❖ 1559 ने उदयसिंह ने उदयपुर की स्थापना ।
❖ उदय सागर झील का निर्माण करवाया ।
❖1568 में अकबर ने चितोड़ पर आक्रमण किया ।
❖ उदयसिंह गिरवा की पहाड़ियों में चला गया ।जयमल तथा पत्ता ने किले का नेतृत्व संभाला ।
❖ इस समय चितौड़ का तीसरा साका हुआ। जयमल ने कल्ला राठौड़ के कंधो पर बैठकर युद्ध लड़ा ।
❖ अकबर ने चितौड़ पर अधिकार कर लिया ।
❖ अकबर ने 30000 लोगो का नरसंहार करवाया ।
❖ कल्ला राठौड़ – चार हाथों वाले लोक देवता के रूप में पूजा जाता है ।
❖ अकबर की बंदूक का नाम – संग्राम
❖ अकबर जयमल व पन्ना की वीरता से प्रभावित हुआ  तथा इन दोनों की मूर्तियां आगरा के किले में लगवाई ।
❖ इस जानकारी का स्रोत – बर्नियर की पुस्तक ट्रेवल्स इन द मुगल एम्पायर में ।
❖ बीकानेर के जूनागढ़ दुर्ग में भी जयमल व पत्ता की मूर्तियां है |
❖ 1572 में होली के दिन उदयसिंह की मृत्यु गोगुन्दा में हुई ।

❖ उदय सिंह की छतरी – गोगुन्दा ।

महाराणा प्रताप 1572-1597

❖ 25 साल शासन 
❖ पत्नी – अजब दे पंवार
❖ जन्म 9 मई 1540 कुम्भलगढ़
❖ पिता – उदय सिंह , माता – जयंता बाई सोनगरा ।
❖ प्रताप के बचपन का नाम – कीका ।
❖ उदय सिंह के छोटे बेटे जगमाल को राजा बना दिया ।
❖ प्रताप का राजतिलक कृष्णदास चूंडावत (सलूम्बर ) ने गोगुन्दा में किया होली के दिन ।
❖ प्रताप का विधिवत राजतिलक कुम्भलगढ़ में हुआ ।
❖ मारवाड़ का चंद्र सेन भी इस राजतिलक में शामिल था ।
❖ अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार दूत भेजे –

1. जलाल खां कोरची 1572 ,

2. मानसिंह  1573

3. भगवंत दास – 1573 

4. टोडरमल 1573

❖ हल्दी घाटी का युद्ध :- 18 जून 1576 (राणा प्रताप और अकबर के बीच )
❖ अकबर के सेनापति – मानसिंह (पहली बार सेनापति,हाथी मर्दाना ) व आसफ खां
❖ प्रताप के सेनापति- 1. सलूम्बर- कृष्णदास चुंडावत
2. ग्वालियर – रामसिंह तोमर
3. अफगान मुस्लिम – हाकिम खां सूर पठान
4. भीलो का नेता – पुंजा भील
❖ मिहत्तर नामक मुस्लिम सैनिक ने अकबर के आने की झूठी सूचना दी।
❖ युद्ध में चेतक घायल हो गया तो राणा प्रताप युद्ध भूमि से बाहर चला गया।
❖ झाला मान (बीदा)ने युद्ध का नेतृत्व किया ।
❖ मानसिंह प्रताप को अधीनता स्वीकार नहीं करा सका। अकबर ने मानसिंह तथा आसफ का दरबार मे नजराना बंद करवा दिया ।
❖ चेतक की छतरी – बलीचा (राजसमंद)
❖ इतिहासकार : हल्दी घाटी युद्ध का नाम :-
1. अबुल फजल : खमनोर का युद्ध
2. बदायुनी : गोगुन्दा का युद्ध
3. जेम्सटॉड : मेवाड़ की थर्मोपॉली
4. आदर्श लाल श्री वास्तव : बादशाह – बाग का युद्ध
❖ मुगल सेना के हाथी :- मर्दाना , गजमुक्ता
❖ मेवाड़ की सेना के हाथी :- लूणा , राम प्रसाद ,वीर प्रसाद ,
❖ 1577 में अकबर में खुद मेवाड़ आक्रमण किया और उदयपुर का नाम बदल कर मुम्मदाबाद कर दिया।
❖ कुम्भलगढ़ का युद्ध :- 1. तीन बार आक्रमण 1577, 1578 व 1579
2. मुगल सेनापति शाह बाज खां ने तीन बार आक्रमण किया और कुम्भलगढ़ पर अधिकार कर लिया ।
❖ शेरपुर की घटना :- 1580
1. अमरसिंह ने मुगल सेनापति रहीम की बेगमो को गिरफ्तार कर लिया था लेकिन प्रताप ने उँन्हे ससम्मान वापस पहुँचाया।
❖ दिवेर का युद्ध :- 1582 ई.(प्रताप की विजय)
1. प्रताप ने मुगल सेना को हरा दिया । अमर सिंह ने मुगल सेनापति सुल्तान खां को मार दिया
2. इस युद्ध मे बांसवाड़ा, प्रतापगढ़,ईडर आदि रियासयो ने प्रताप का साथ दिया । जेम्स टॉड ने इस युद्ध को मेवाड़ का मैराथन कहा।
❖ 1585 में जगनाथ कछवाह ने मेवाड़ पर आक्रमण किया | यह अकबर की तरफ से अंतिम आक्रमण था |
❖ प्रताप ने मालपूरा (टोंक ) पर आक्रमण किया और जीत लिया तथा नीलकंठ महादेव मंदिर बनवाया |
❖ प्रताप ने चावंड को राजधानी बनाया |
❖ चावंड में चामुंडा माता का मंदिर बनवाया |
❖ चावंड से मेवाड़ की चित्रकला प्रारम्भ हुई । मुख्य चित्रकार नासिरूद्दीन
❖ दरबारी विद्वान :-
1. चक्रपाणि मिश्र – पुस्तक – (i) राज्याभिषेक (ii) मुहूर्तमाला (iii) विश्व वल्लभ ( उद्यान विज्ञान के बारे में )
2. हेमरत्न सूरी :- गौरा बादल री चौपाई
3. सदुलनाथ त्रिवेदी :- इसे प्रताप ने मंडेर की जागीर दी । यह जानकारी उदयपुर अभिलेख 1588 में मिलती है |
4. भामाशाह और ताराचंद :- राणा प्रताप की आर्थिक सहायता की |
5. माला सांदू
6. रामा सांदू
❖ प्रताप ने चितौड़गढ़ व मांडलगढ़ को छोड़कर पूरा मेवाड़ जीत लिया था ।
❖ 19 जनवरी 1597 में चावंड में राणा प्रताप की मृत्यु ।

❖ प्रताप की छतरी – 8 खंभो की छतरी (बांडोली , उदयपुर )

❖ महाराणा प्रताप को मेवाड़ केसरी कहा जाता है |

अमरसिंह प्रथम 1597-1620

❖ मुगल मेवाड़ संधि :- 1615
1. अमरसिंह प्रथम व जहांगीर
2. अमरसिंह ने यह संधि अपने बेटे कर्ण सिंह के दबाव में की ।
3. संधि में मेवाड़ के प्रतिनिधि – हरिदास व  शुभकरण
4. मुगलो की तरफ से खुर्रम ने संधि की ।

❖ संधि की शर्तें ;-

1. मेवाड़ का राणा मुगल दरबार ने नही जाएगा ।
2. मेवाड़ के राज कुमार मुगल दरबार मे जाएगा ।
3. चित्तौड़ का किला मेवाड़ को वापस दिया जायेगा पर उसका पुनर्निर्माण नही करवाया जायेगा।
4. युवराज कर्ण सिंह मुगल दरबार मे उपस्थित हुआ था । कर्ण सिंह को जहांगीर ने 5000 का मनसबदार बनाया गया ।
5. जहांगीर ने अमरसिंह तथा कर्ण सिंह की मूर्तियां आगरा के किले में लगवाई ।
6. अमरसिंह इस संधि से निराश हुआ तथा नौ चौकी नामक स्थान पर जाकर रहने लगा ,  जहां बाद में राजसमन्द झील बनाई गई ।

कर्णसिंह 1620-1628

❖ जगमंदिर महलो का निर्माण शुरू करवाया |

❖ खुर्रम विद्रोह के दौरान इन महलो में रुका |

❖ उदयपुर में कर्णविलास व दिलखुश महल बनवाया |

जगतसिंह प्रथम 1628-1652


❖ जगमन्दिर महलों का निर्माण पूर्ण करवाया ।

❖ उदयपुर में जगदीश मंदिर (जगन्नाथ राय मंदिर ){वास्तुकार – अर्जुन भाणा मुकुंद } का निर्माण करवाया | इसे सपनों में बना मंदिर कहते है ।

❖ जगन्नाथ राय प्रशस्ति के लेखक – कृष्ण भट्ट (हल्दी घाटी के युद्ध का वर्णन)

❖ उदयपुर में नॉजुबाई का मंदिर बनवाया |

❖ जगतसिंह दानवीरता के लिए प्रसिद्ध था |

राज सिंह 1652-1680

❖ उपाधि – विजय कटकातु

❖ इसके समय शाहजहां बीमार हुआ व इसके पुत्रो से उत्तराधिकार को लेकर युद्ध हुआ राजसिंह ने इसका फायदा उठाते हुए मेवाड़ में टिका दौड़ उत्सव की आड़ में मुगल ठिकानों को लूट लिया ।

❖ औरगजेब ने राजसिंह को मेवाड़ में सर्वाधिक 4000 मनसब दिया ।

❖ औरगजेब व राजसिंह के बीच विवाद के कारण :-

1. चारुमती विवाद – किशनगढ़ के शासक मानसिंह ने अपने बहन चारुमती की संगाई औरगजेब से की । राजसिंह ने ओरंगजेब के विरोध जाकर विवाह किया इस विवाह के बाद मेवाड़ मुगलों की सेना के मध्य देसूरी की नाल में युद्ध हुआ जिसमें मेवाड़ विजय रहा । युद्ध की महत्वपूर्ण घटना इस युद्ध मे राजसिंह के सेनापति रतनसिंह चुंडावत की रानी सहल कंवर (हांडी रानी ) ने निशानी के तौर पर अपना सिर काटकर रतनसिंह को दिया ।

2. औरगजेब द्वारा 1669 में हिन्दू मंदिरों को तोड़ने का आदेश दे दिया राजसिंह इसके विरोध कई हिन्दू मंदिरों का निर्माण किया जिसमें प्रमुख श्रीनाथ जी व द्वारकाधीश मंदिर है ।

3. राजसिंह ने संधि का उल्लंघन करते हुए चित्तौड़ दुर्ग की मरमत करवायी ।

4. 1679 में औरगजेब के द्वारा हिन्दुओ पर जजिया कर लगाया गया राजसिंह ने इसका विरोध किया ।

5. राजसिंह ने औरगजेब के विरोध जाकर जोधपुर के शासक अजीतसिंह व दुर्गादास राठौड़ को शरण दी ।

6. राजसिंह ने औरगजेब के पुत्र अकबर का सहयोग किया ।

❖ राजसिंह की मृत्यु 1680 में जहर देने के कारण कुम्भलगढ़ में हुई ।

❖ राजसिंह ने 1662 में गोमती नदी के पानी को रोककर राजसमंद झील का निर्माण करवाया ।

महाराणा जयसिंह 1680-1698


❖ जयसिंह ने  जयसमंद झील  का निर्माण करवाया गया ।

❖ जयसिंह के समय दूसरी मेवाड़ मुगल संधि हुई ।

अमरसिंह II (1698-1710)


❖ अमरसिंह के समय 1708 का देवारी समझौता किया गया । यह समझौता मारवाड़ के शासक अजीतसिंह व जयपुर के शासक सवाई जय सिंह II व अमरसिंह II के मध्य हुआ ।

❖ इस समझौते के तहत अमरसिंह की पुत्री चंद्रकुंवरी का विवाह सशर्त सवाई जयसिंह द्वितीय के साथ किया गया ।

संग्राम सिंह II (1710-1734)

❖ संग्राम सिंह द्वितीय ने उदयपुर में सहलियो की बाड़ी का निर्माण करवाया ।

❖ संग्रामसिंह के द्वारा 17 जुलाई 1734 में भीलवाड़ा के हुरड़ा नामक स्थान पर मराठो के विरोध हुरड़ा सम्मेलन बुलाया गया परन्तु सम्मेलन से पहले संग्रामसिंह की मृत्यु हो गई।

जगत सिंह 1734 -1778

❖ इन्होंने पिछोला झील पर जग निवास महल का निर्माण करवाया ।

❖ मेवाड़ में प्रवेश कर लगाने वाले थे प्रथम महाराणा थे ।

❖ इन्ही के काल मे हुरड़ा सम्मेलन किया गया जिसकी अध्यक्षता जगत द्वितीय ने की थी ।

❖ दरबारी साहित्यकार नेकराम/नेतराम ।

❖ जगत सिंह द्वितीय के काल मे ही दिल्ली मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला पर माड़ी शाह का आक्रमण हुआ ।

भीमसिंह :-

इसकी पुत्री कृष्णा कुमारी की पहले संगाई भीमसिंह भाई मानसिंह (मारवाड़) के परन्तु विवाह से पहले मृत्यु हो गई। कृष्णा कुमारी की दूसरी सगाई जगत सिंह द्वितीय(जयपुर ) के साथ हुई।

❖ गिगोली / परवतसर का युद्घ :- 1. 1807 जगतसिंह द्वितीय (जयपुर व मानसिंह (मारवाड़ )

2. विवाद शांत नहीं होने पर दो व्यक्तियो (अजित सिंहचुंडावत व अमीर खां पिंडारी )की साल पर कृष्णा कुमारी को जहर देकर मार दिया।

3 . 13 जनवरी 1818 को भीमसिंह ने अंग्रेजों से संधि कर ली ।

4. जो दृढ राखे धर्म को ,तिहि राखे करतार। (यह लाइन मेवाड़ के राज चीन्ह पर लिखी गई थी।

❖ स्वरूप सिंह :- 1857 की क्रांति के समय राजा
❖ फतेहसिंह :– बिजोलिया किसान आंदोलन के समय राजा ।
❖ महाराणा भोपाल सिंह :- राज. के एकीकरण के समय राजा ।

 

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