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राजस्थान में चित्रकला ( Painting in Rajasthan

राजस्थान में चित्रकला (Painting in Rajasthan)

Painting in Rajasthan  राजस्थान में चित्रकला की विभिन्न पाठशालाओं का क्रम वार अध्ययन करने जा रहे है ।

राजस्थानी चित्र शैली का सर्वप्रथम वैज्ञानिक विभाजन आनंद कुमार स्वामी द्वारा किया गया।

1916 ई. मैं इन्होंने राजपूत पेंटिंग नामक पुस्तक लिखी। राजस्थानी चित्रकला अपभ्रंश शैली अर्थात गुजरात शैली से संबंधित है।

राजस्थान में चित्रकला की शुरुआत 15 -16 वी सदी में मानी जाती है।

श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णी प्रथम चित्रित ग्रंथ है ,जो आहड़ से प्राप्त हुई।

1423 ईस्वी का सुपासनाह चरियम ‘ नामक ग्रंथ महाराणा मोकल के शासनकाल में देलवाड़ा से प्राप्त हुआ है ,इसका चित्रकार हीरानंद था। वर्तमान में यह सरस्वती संग्रहालय उदयपुर में सुरक्षित है।

श्रृंगधर राजस्थानी चित्रकला का प्रथम चित्रकार था। जिसका उल्लेख तिब्बत के लामा तारा नाथ ने किया है।

17 वीं -18वीं सदी को राजस्थानी चित्रकला का स्वर्ण युग माना जाता है।

राजस्थान में चित्रकला का जनक महाराणा कुंभा को माना जाता है।

मास्टर कुंदन लाल मिस्त्री को राजस्थान में आधुनिक चित्रकला का जनक माना जाता है।

आधुनिक प्रयोगवादी चित्रकार परमानंद चॉयल को भैंसों का चितेरा कहा जाता है।

भीलो के चितेरा के रूप में गोवर्धन लाल, नीड़ का चितेरा के रूप में सौभागमल को जाना जाता है।

रवि वर्मा को भारत में आधुनिक चित्रकला का जनक माना जाता है।

राजस्थानी चित्रकला का वर्गीकरण

1. मेवाड़ स्कूल – उदयपुर, चावंड, राजसमंद, देवगढ़, शाहपुरा, बागोर आदि।

2. मारवाड़ी स्कूल – जोधपुर, जैसलमेर, अजमेर किशनगढ़,बीकानेर, नागौर, सिरोही आदि।

3.हाडौती स्कूल – कोटा, बूंदी, झालावाड़, दुगारी आदि।

4. ढूंढाड़ स्कूल – आमेर, उनियारा, अलवर, जयपुर,शाहपुरा,शेखावटी आदि।

PAINTING IN RAJASTHAN

मेवाड़ शैली (उदयपुर शैली)

राजस्थान की चित्रकला की मूल शैली।

राजस्थान में चित्रकला का जन्म मेवाड़ से माना जाता है।

कुंभा के शासन काल में चित्रकला की शुरुआत हुई।

सर्वाधिक विकास महाराणा अमर सिंह प्रथम के शासनकाल में हुआ।

जगत सिंह प्रथम के शासनकाल को मेवाड़ चित्रकला का स्वर्ण काल कहा जाता है।

जगत सिंह प्रथम के काल में चितेरो की ओवरी/तस्वीरों रो कारखानों नामक कला विद्यालय स्थापित किया गया।

जगत सिंह प्रथम के काल को मेवाड़ की लघु चित्र शैली का स्वर्ण काल माना जाता है।

यहां के प्रमुख चित्र कदम्भ वृक्ष से संबंधित है।

भीम सिंह के शासनकाल में भित्ति चित्रों का सर्वाधिक निर्माण हुआ।

संग्राम सिंह द्वितीय के समय प्रमुख चित्रकार नूरुद्दीन था, जिसने कलीला दमना पर अनेक चित्र बनवाएं।

साहिबद्दीन द्वारा चित्रित भागवत पुराण तथा मनोहर का रामायण मेवाड़ शैली के उत्कृष्ट उदाहरण है।

कलीला दमना मेवाड़ शैली में चित्रित पंचतंत्र कहानी के दो पात्र है।

प्रमुख चित्र – रामायण, महाभारत, रसिकप्रिया, पंचतंत्र, पृथ्वीराज रासो, गीतगोविंद, भागवत पुराण।

प्रमुख चित्रकार – साहिबद्दीन, कृपा राम, मनोहर, भैरू राम, नसरुद्दीन, जीवाराम आदि।

चावंड शैली (उदयपुर)

मेवाड़ की उप शैली है।

1585 ईस्वी में जब प्रताप ने चावंड को अपनी राजधानी बनाई ,तब से इसका विकास शुरू हो गया।

प्रताप के समय चित्रित प्रसिद्ध कृति ढोला मारू जो राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली में सुरक्षित है।

अमर सिंह प्रथम के काल में 1605 ईस्वी में नसीरुद्दीन ने राग माला का चित्रण किया।

अमर सिंह का काल मेवाड़ की चावंड शैली का स्वर्ण काल कहलाता है।

नाथद्वारा शैली

यह शैली उदयपुर तथा ब्रज शैली का समन्वित रूप है। इस शैली में श्रीनाथजी से संबंधित स्वरूप को बड़े आकार के कपड़े पर चित्रित किया गया है।

❖इस शैली में हरे पीले रंगों का अधिक प्रयोग किया गया है।

इस चित्रकला शैली का सर्वाधिक विकास तिलकायत श्री गोवर्धन जी के समय हुआ।

प्रमुख चित्रकार- उदयराम, चतुर्भुज, घासीराम, नारायण, चंपालाल, हीरालाल आदि।

जोधपुर शैली

यह मारवाड़ की उप शैली थी।

19वीं सदी में मारवाड़ नाथ संप्रदाय से प्रभावित रहा इसलिए मानसिंह के समय चित्रकला का विकास मठों में हुआ।

इस शैली का सर्वाधिक विकास मालदेव के शासनकाल में हुआ था।

मोटा राजा उदयसिंह के काल में इस शैली पर मुगल शैली का प्रभाव शुरू हो गया।

वीर जी चित्रकार द्वारा 1623 ईस्वी में बनाया गया राग माला का चित्र ऐतिहासिक महत्व का है।

यहां के प्रमुख चित्रों में वेलि कृष्ण रुक्मणी री, वीरमदेव सोनगरा री बात, फूलमती री वार्ता तथा चंद्र कुंवर री बात को आधार माना गया है।

प्रमुख चित्रकार – शंकर दास, कालूराम, किशनदास, शिवदास, देवदास, नारायण दास, भाटी अमर दास आदि।

प्रमुख चित्र – मधु के टीले छोटी छोटी झाड़ियां, ऊंट, हिरण, घोड़े, प्यासे कौए की कहानी, ढोला मारु का चित्र।

जैसलमेर शैली

यह मारवाड़ की उप शैली है।

इस शैली का सर्वाधिक विकास मूलराज द्वितीय के शासनकाल में हुआ था।

प्रमुख चित्र – लोद्रवा की राजकुमारी मूमल हैं।

किशनगढ़ शैली

यह मारवाड़ की उप शैली है।

इसे कागजी शैली भी कहा जाता है।

इस शैली का सर्वाधिक विकास नागरी दास के शासनकाल में हुआ।

1973 ईस्वी में डाक तार विभाग द्वारा बणी-ठणी पर डाक टिकट जारी की।

इस चित्रकला शैली को भारत की श्रेष्ठ चित्रकला कहा जाता है।

इस चित्रकला शैली को प्रकाश में लाने का श्रेय एरिक डिक्सन तथा डॉक्टर फैयाज को है।

चांदनी रात संगीत गोष्टी एक शैली का प्रमुख चित्रित ग्रंथ है।

एरिक डिक्सन ने बणी-ठणी को भारत की मोनालिसा कहा है।

प्रमुख चित्र – झील, नदियां, झील में तैरता हुआ बत्तख, मछली के समान महिलाओं के नेत्र, पारदर्शी वस्त्रों का चित्रण, महिलाओं के अर्द्ध विकसित किंतु उन्नत और खींचा हुआ वक्ष स्थल, राधा के बहाने नायिका के रूप यौवन को उजागर किया गया है।

प्रमुख चित्रकार – निहालचंद, लाडली दास, सूरध्वज, भंवर दास, सवाई राम, रामनाथ, बदन सिंह, नानकराम, धन्ना, अमीरचंद, तुलसीदास।

कोटा शैली

यह हाड़ौती की उप शैली है।

भीम सिंह के शासनकाल में वल्लभ संप्रदाय का प्रभाव देखने को मिलता है।

इस शैली का सर्वाधिक विकास महारावल रामसिंह द्वितीय के शासनकाल में हुआ था।

कोटा के उत्कृष्ट भित्ति चित्र झाला की हवेली, राजमहल, देवता जी की हवेली में मिलते हैं।

उम्मेद सिंह के शासनकाल में कोटा शैली  अपने चरम बिंदु पर पहुंच गई, इसी कारण उम्मेद सिंह के शासनकाल को कोटा शैली का स्वर्ण काल कहा जाता है।

उमेश सिंह के शासनकाल में शिकार के दृश्य चित्रित किए गए।

1768 ईस्वी में डालू नामक चित्रकार द्वारा चित्रित राग माला का चित्र कोटा शैली का प्रमुख चित्र माना जाता है।

इस शैली में हरे, पीले तथा नीले रंग की प्रधानता दिखाई देती है।

प्रमुख चित्र – शिकार के दृश्य, युद्ध के दृश्य, कदंब वृक्ष के नीचे बैठा सिंह।

 यह शैली शिकार शैली कहलाती है।

प्रमुख चित्रकार – गोविंद राम, नूर मोहम्मद, डालूराम, लच्छीराम आदि।

बूँदी  शैली

यह शैली हाड़ौती शैली की उप शैली है

मेवाड़ और मुगल शैली का मिश्रित रूप है।

इस शैली का सर्वाधिक विकास सुर्जन हाडा के शासनकाल में हुआ था।

इस शैली में नारंगी तथा हरे रंग की प्रधानता मिलती है।

इस शैली को पशु-पक्षी शैली भी कहा जाता है।

बूंदी के शासक छत्रसाल ने रंग महल बनवाया जो भित्ति चित्रों से सुसज्जित हैं।

महारावल उम्मेद सिंह के शासनकाल में बना चित्र चित्रशाला प्रसिद्ध है।

इस शैली में राग रागिनी, नायिका भेद, ऋतु वर्णन, बारहमासा, शिकार, हाथियों की लड़ाई आदि का चित्रण हुआ है।

बारहमासा में चेत्र से फाल्गुन का वर्णन मिलता है।

आमेर शैली

यह ढूंढाङ की उप शैली है।

सवाई प्रताप सिंह का काल जयपुर शैली का स्वर्ण काल माना जाता है।

इस शैली का सर्वाधिक विकास रामसिंह द्वितीय के शासनकाल में हुआ।

इस शैली में सफेद लाल नीला पीला तथा हरा रंग प्रयुक्त किया गया।

यह शैली मुगल तथा राजस्थानी चित्रकला का मिश्रण मानी जाती है।

यह शैली मुगल शैली से अत्यधिक प्रभावित थी।

महाराजा रामसिंह द्वितीय ने 1859 ईस्वी में राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट्स व अल्बर्ट हॉल संग्रहालय की स्थापना की।

प्रमुख चित्र – लैला मजनू, कुश्ती दंगल, रामलीला, घोड़े की दौड़।

प्रमुख चित्रकार साहिब राम थे जिन्होंने ईश्वर सिंह का आदम कद चित्र बनवाया।

अलवर शैली

यह ढूंढाङ शैली की उप शैली है।

प्रताप सिंह के शासनकाल में अलवर शैली की शुरुआत हुई।

अलवर शैली का मौलिक स्वरूप महाराजा बख्तावर सिंह के शासनकाल में देखने को मिलता है।

विनय सिंह का शासन काल अलवर शैली का स्वर्ण काल माना जाता है।

यह शैली जयपुर शैली का मिश्रण है।

यह शैली अपनी अश्लीलता के लिए प्रसिद्ध है यहां सर्वाधिक वेश्याओं के चित्र मिलते हैं।

राजस्थान की चित्रकला
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1.सबसे पहले राजपूत पेंटिंग्स नाम से पुस्तक किसने लिखी?

2.राजस्थान की चित्रकला को भौगोलिक व सांस्कृतिक रूप से कितने भागों में बांटा गया है?

3.राजस्थान चित्रकला की जन्म भूमि मानी जाती है?

4.’श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि’ चित्रित ग्रंथ किसके शासन काल मे था?

5.महाराणा मोकल के शासन काल मे कौनसा चित्रित ग्रंथ था?

6.रागमाला का चित्रण किसके शासनकाल में किया ?

7.मेवाड़ की चित्रकला का स्वर्णकाल किसके शासनकाल को कहा जाता है?

8.किस चित्रकला में मेवाड़ ,मारवाड़ व ढूंढाड़ का मिश्रण है?

9.जोधपुर की चित्रकला किसके शासनकाल के समय प्रारम्भ हुई?

10.मथेरणा कला कहाँ की प्रसिद्ध है?

इन्हें भी देखे –

1.हर्षकालीन भारत
2.मौर्य काल
3.गुप्त काल
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