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RAJASTHAN HISTORY

आमेर के कच्छवाहा वंश ( HISTORY OF AAMER )

आमेर के कच्छवाहा वंश

कच्छवाहा अपने आप को भगवान श्री राम के पुत्र कुश की संतान मानते थे।
कच्छवाहा वंश के संस्थापक – दुल्हराय
दुल्हराय के वंशज कोकिलदेव ने 1207 ई. मीणाओ से आमेर जीतकर अपनी राजधानी बनाई।
आमेर कच्छवाहा वंश की राजधानी 1207 से लगाकर 1727 ई. तक रही।
इसी वंश के शेखा ने शेखावटी में अपना अलग राज्य बनाया।
भारमल (1547 – 1574)
राजस्थान का प्रथम शासक जिसने अकबर की अधीनता स्वीकार की।
1562 ई. में अपनी पुत्री हरखा बाई /मानमति/ मरियम उज्जमानी का विवाह अकबर से किया।
मुगल बादशाह जहाँगीर हरखाबाई का पुत्र था।
भगवंत दास (1574 – 1589)
भारमल का पुत्र।
अपनी पुत्री मानबाई का विवाह शहजादे सलीम (जहाँगीर)से किया।
मानबाई को सुलताब निस्सा की उपाधि प्राप्त थी।
खुसरो मानबाई का पुत्र था।
मानसिंह (1589 – 1614)
भगवंत दास का पुत्र।
आमेर के कच्छवाह शासकों में सर्वाधिक प्रतापी एवं महान राजा ।
52 वर्ष तक मुगलो की सेवा की।
1573 ई. में अकबर के दूत के रूप में महाराणा प्रताप से भेंट।
1576 ई.में हल्दीघाटी युद्ध मे अबकर की सेना का नेतृत्व।
अकबर के नौ रत्नों में से एक।
अकबर ने उसे फ़र्जन्द (पुत्र) व राजा की उपाधि प्रदान की।
❖मानसिंह ने बंगाल में अकबर नगर तथा बिहार में मानपुर नगर को बसाया।
❖शिलादेवी(आमेर), जगत शिरोमणी(आमेर),गोविंद देवजी(वृंदावन)मंदिर बनाये।

मिर्जा राजा जयसिंह (1621 – 1667)
❖तीन मुगल बादशाहों की सेवा की। (जहाँगीर ,शाहजहां व औरगजेब)
1665 ई.में पुरन्दर की संधि ।
जून, 1665 ई. में शिवाजी के साथ पुरन्दर की संधि।
शाहजहां ने मिर्जा राजा की उपाधि प्रदान की।
बिहारी इनके दरबारी कवि ।
बिहारी का भांजा कुलपति मिश्र जिसने 52 ग्रन्थों की रचना की थी , वो भी दरबारी कवि थे।
मृत्यु – बुरहानपुर में।

सवाई जयसिंह (1700 – 1743)

वास्तविक नाम विजयसिंह
सवाई जयसिंह ने मराठो से तीन बार युद्ध किये।
सवाई जयसिंह द्वारा जाटों पर मुगलों की विजय होने के उपलक्ष्य पर मुहम्मद शाह ने जयसिंह को राज राजेश्वर , राजाधिराज , सवाई की उपाधि प्रदान की।
मेवाड़ के महाराणा जगतसिंह द्वितीय से मिलकर 1734 ई. में हुरड़ा में सम्मेलन आयोजित किया।
जयसिंह कारिका नामक ज्योतिष ग्रंथ की रचना ।
दिल्ली , वाराणसी ,मथुरा व उज्जैन (दिवा मउ ) वैध शाला बनवाई।
सबसे बड़ी वैधशाला जयपुर में ।
सर्वप्रथम वैधशाला दिल्ली में बनवाई।

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